चांदनी रात में चांद का नूर लिए
बैठी थी वो फूलो के मखमल पे
मेरे इंतजार में
और चुपके से मेरी आंखो में आंखे डालके कहती
मेरे होठों को चूम के रशील करदो
गालों पे मेरे ; अपने होठों से मिला लो
चूम के सारे बदन को सहला दो
मुझको अपने बदन से लगा के गरम करदो
और मुझे अपनी रूह में मिलाके
किस्सा कहानी एक करदो।
गले पे निशानी चाहे जितनी करदो
फिर भी मन नही भरे तो जंग की शुरुआत करदो।
फिर चूम के उसके बदन को किस्सा कहानी इक कर दिया
उसको चूम कर चांद का नूर उसके नाम कर दिया ।।